‘कौन प्रशांत किशोर’ बयान पड़ा भारी?
बांकीपुर में BJP के दिग्गज नेताओं के बूथों पर चौंकाने वाले चुनावी आंकड़े
पटना, 05 अगस्त 2026 । बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई वरिष्ठ नेताओं के बूथों के मतदान आंकड़े राजनीतिक चर्चा का विषय बन गए हैं। चुनाव परिणामों के विश्लेषण में सामने आए आंकड़ों के आधार पर विपक्ष यह दावा कर रहा है कि जिन नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान “कौन प्रशांत किशोर” जैसी टिप्पणियां की थीं, उनके अपने बूथों पर भी पार्टी को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका। हालांकि, इस दावे को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के संदर्भ में देखा जा रहा है।
10 महीने में बहुत कुछ बदल गया
प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोटों से शिकस्त दी। इस दौरान झटका सिर्फ बीजेपी को ही नहीं बल्कि विपक्षी राजद को भी लगा। तेजस्वी यादव की उम्मीदवार को वैश्यों ने ही ढंग से वोट नहीं किया, महागठबंधन के बाकी वोट भी तरीके से ट्रांसफर नहीं हो पाए। नतीजा ये हुआ कि सिर्फ 10 महीने में बांकीपुर के वोटरों का मिजाज ऐसा बदला कि जिस जन सुराज (उम्मीदवार वंदना कुमार) को 2025 के विधानसभा चुनाव में 8 हजार के करीब वोट मिले थे। उसने 9 गुनी रफ्तार पकड़ प्रशांत किशोर की अगुवाई में 64,151 वोट हासिल कर लिए।
चुनावी आंकड़ों के अनुसार, कुछ प्रमुख नेताओं के बूथों पर भाजपा को उम्मीद से कम वोट मिले, जबकि विपक्षी दलों और प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने कई क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन का दावा किया। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से चुनाव परिणामों की व्याख्या कर रहे हैं और इसे मतदाताओं के बदलते रुझान से जोड़ रहे हैं।
आखिर क्यों हुआ ये हाल
प्रशांत किशोर की जीत और बीजेपी की हार के पीछे वैसे तो कई कारण गिनाए जा रहे हैं। लेकिन इनमें सबसे ज्यादा सवर्ण मतदाताओं का आक्रोश था। कई वीडियो में मतदाता यहां तक कहते सुने गए कि ‘UGC एक्ट लाकर इस सरकार ने सवर्णों के बच्चों को पैदा होते ही अपराधी घोषित कर दिया है।’ कुछ वोटर तो यहां तक कहते सुने गए कि पिछले 30 साल से वो बीजेपी को वोट कर रहे हैं, वो संघ के स्वयंसेवक और कारसेवक भी रहे हैं, लेकिन इस बार वो बीजेपी को हरगिज वोट नहीं देंगे। ऐसा नहीं था कि बीजेपी को इसकी भनक नहीं थी। लेकिन वो अपने कोर वोटरों को किसी भी तरह से समझाने में नाकाम रही, क्योंकि गुस्सा बहुत ज्यादा था।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी उपचुनाव में बूथवार परिणाम स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, संगठन की सक्रियता और मतदान प्रतिशत जैसे कई कारकों से प्रभावित होते हैं। इसलिए केवल कुछ बूथों के आंकड़ों के आधार पर व्यापक राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जाता। फिर भी ऐसे आंकड़े राजनीतिक दलों के लिए संगठनात्मक समीक्षा और चुनावी रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बांकीपुर उपचुनाव के बाद भाजपा, जन सुराज और अन्य राजनीतिक दल आगामी चुनावों की तैयारियों में जुट गए हैं। ऐसे में बूथवार मतदान के आंकड़ों का विश्लेषण भविष्य की रणनीति बनाने का अहम आधार बन सकता है। आने वाले समय में सभी दल इन नतीजों से मिले संकेतों के आधार पर अपने संगठन और चुनावी अभियान को और मजबूत करने का प्रयास करेंगे।