देहरादून, 25 सितंबर 2026 । उत्तराखंड में बिजली संकट गहराता जा रहा है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में बिजली कटौती का समय 35 मिनट से लेकर 15 घंटे तक पहुंच गया है। इसका सबसे ज्यादा असर कुमाऊं और गढ़वाल के भारी उद्योगों पर पड़ा है, जबकि ग्रामीण और शहरी इलाकों में भी कई घंटे की रोस्टरिंग की जा रही है। उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPCL) ने बिजली की उपलब्धता और मांग के बीच बढ़े अंतर को देखते हुए अलग-अलग श्रेणी के उपभोक्ताओं के लिए कटौती लागू की है।
UPCL के प्रबंध निदेशक पीसी ध्यानी ने कहा कि उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड इस सितंबर में पिछले साल की तुलना में कम बिजली पैदा हुई है। उन्होंने कहा पिछले साल सितंबर में पीक आवर्स के दौरान उत्पादन 1094 मेगावाट था, जो नदियों का प्रवाह घटने के कारण इस साल घटकर 912 मेगावाट रह गया है। उन्होंने औसतन 170 मेगावाट की कमी का अनुमान जताया।
इस संकट की प्रमुख वजह इस साल मानसून के दौरान अपेक्षाकृत कम बारिश और इसके कारण नदियों के जल प्रवाह में आई कमी बताई जा रही है। उत्तराखंड की बिजली व्यवस्था में जलविद्युत परियोजनाओं की बड़ी भूमिका है। नदियों में पानी का प्रवाह घटने से हाइड्रो पावर प्लांटों का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है।
UPCL के मुताबिक सितंबर में पीक आवर्स के दौरान जलविद्युत उत्पादन पिछले साल के 1,094 मेगावाट से घटकर करीब 912 मेगावाट रह गया। यानी करीब 170-180 मेगावाट की कमी दर्ज की गई।
मांग और उपलब्ध बिजली में बढ़ा अंतर
बिजली की मांग और उपलब्धता में अंतर भी संकट को बढ़ा रहा है। UPCL के अनुसार प्रदेश में बिजली की मांग करीब 53 मिलियन यूनिट प्रतिदिन है, जबकि उपलब्ध आपूर्ति लगभग 48 मिलियन यूनिट के आसपास है। इस अंतर को पूरा करने के लिए अतिरिक्त बिजली खरीदने और रोस्टरिंग का सहारा लिया जा रहा है।
प्रदेश की दैनिक बेस लोड आवश्यकता करीब 2,700 मेगावाट बताई गई है। इसमें लगभग 1,000 मेगावाट राज्य के स्वामित्व वाले जलविद्युत संयंत्रों से आती है। ऐसे में हाइड्रो उत्पादन में कमी का सीधा असर बिजली की कुल उपलब्धता पर पड़ रहा है।
टिहरी परियोजना की दो इकाइयां भी बंद
संकट की एक और वजह टिहरी क्षेत्र की जलविद्युत परियोजना की दो इकाइयों का तकनीकी कारणों से बंद रहना है। इससे पीक आवर्स में करीब 100 मेगावाट बिजली की उपलब्धता प्रभावित हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दो इकाइयां अलग-अलग तारीखों से बंद हैं, जिससे बिजली संकट के समय अतिरिक्त दबाव बढ़ा।
इसके अलावा केंद्रीय ग्रिड से मिलने वाली बिजली में भी पिछले साल की तुलना में कमी आई है। रिपोर्ट के अनुसार पीक आवर्स में केंद्रीय आवंटन 426 मेगावाट से घटकर करीब 338 मेगावाट रह गया।
भारी उद्योगों को 15 घंटे तक बिजली कटौती
बिजली संकट का सबसे ज्यादा असर भारी उद्योगों पर देखने को मिला है। कुमाऊं और गढ़वाल के भारी उद्योगों में 21 और 22 सितंबर को करीब 15 घंटे तक कटौती की गई। इससे पहले भी अलग-अलग दिनों में 13 से 14 घंटे से अधिक की रोस्टरिंग की गई थी।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी कटौती की अवधि कई घंटे रही। ग्रामीण कुमाऊं में करीब 2 घंटे 40 मिनट और ग्रामीण गढ़वाल में लगभग 3 घंटे की कटौती दर्ज की गई। वहीं हल्द्वानी में करीब 35 मिनट की कटौती हुई। इससे साफ है कि कटौती की अवधि उपभोक्ता श्रेणी और क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग रखी गई है।
संकट से निपटने के लिए UPCL ने केंद्रीय ग्रिड से अतिरिक्त बिजली की मांग की है। रिपोर्टों के अनुसार अलग-अलग महीनों के लिए 100 से 400 मेगावाट तक अतिरिक्त बिजली मांगी गई है। इसके अलावा निगम बिजली एक्सचेंज से भी बिजली खरीदने की कोशिश कर रहा है।
त्योहारी सीजन के साथ हरिद्वार में आगामी अर्धकुंभ के दौरान बिजली की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
बिजली की कमी को कुछ हद तक पूरा करने के लिए एक गैस आधारित संयंत्र को दोबारा चलाने की व्यवस्था की गई है। इससे करीब 90 मेगावाट अतिरिक्त बिजली मिलने की उम्मीद जताई गई है। साथ ही UPCL बिजली के स्रोतों में विविधता लाने पर भी काम कर रहा है, ताकि केवल जलविद्युत पर निर्भरता कम की जा सके।
आगे क्या है चुनौती?
उत्तराखंड के सामने तत्काल चुनौती पीक आवर्स में बिजली की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना है। कम जल प्रवाह, हाइड्रो परियोजनाओं की तकनीकी समस्याएं, केंद्रीय ग्रिड से कम आपूर्ति और कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर बारिश का असर—इन सभी कारणों ने मिलकर मौजूदा स्थिति को कठिन बनाया है।
UPCL की ओर से अतिरिक्त बिजली की व्यवस्था के साथ-साथ उपलब्ध जल संसाधनों का पीक डिमांड के दौरान अधिक प्रभावी इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है। निगम ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में बिजली के अलग-अलग स्रोतों को बढ़ाकर हाइड्रो पावर पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम किया जाएगा।