जातीय खाई पर स्वामी रामदेव की चिंता,

बोले- एकतरफा कानून से देश में गृहयुद्ध जैसे हालात न बन जाएं

हरिद्वार , 21  सितंबर 2026 । जातीय भेदभाव और आरक्षण को लेकर देश में जारी बहस के बीच योगगुरु स्वामी रामदेव ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने सवर्ण समाज और पिछड़े, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा आदिवासी समुदायों के बीच बढ़ती दूरी पर चिंता जताई। रामदेव ने कहा कि किसी भी वर्ग के साथ जाति के आधार पर प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए और कानून बनाते समय सभी पक्षों का ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि यदि किसी कानून को एकतरफा तरीके से लागू किया गया और उससे किसी वर्ग में लगातार असंतोष पैदा हुआ, तो देश में गृहयुद्ध जैसे हालात बनने की स्थिति पर भी विचार करना होगा।

‘किसी की प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए’

स्वामी रामदेव ने अपने बयान में यह भी कहा कि जाति के आधार पर किसी व्यक्ति या समुदाय की प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक यह बात सवर्णों के साथ-साथ पिछड़े, SC, ST और आदिवासी समुदायों पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए।

उन्होंने कानूनों को लेकर भी संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत बताई। रामदेव के अनुसार यदि कोई कानून किसी एक वर्ग को प्रभावित करता है और उससे दूसरे वर्ग में लगातार असंतोष पैदा होता है, तो उसके सामाजिक प्रभाव पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

‘गृहयुद्ध’ वाले बयान का संदर्भ क्या है?

रामदेव ने जातीय विभाजन को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि देश में ऐसी स्थिति नहीं बननी चाहिए जहां सामाजिक तनाव इतना बढ़ जाए कि गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा होने की आशंका हो। यह उनकी आशंका और राजनीतिक-सामाजिक टिप्पणी है; इसे देश में गृहयुद्ध की वास्तविक स्थिति होने के तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उनका बयान ऐसे समय आया है जब देश में जातीय प्रतिनिधित्व, आरक्षण और उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसरों को लेकर अलग-अलग वर्गों की ओर से बहस और विरोध सामने आ रहे हैं।

जातीय जनगणना और आरक्षण पर भी जारी है बहस

जाति से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर लगातार राजनीतिक और सामाजिक चर्चा में हैं। केंद्र सरकार ने अप्रैल 2025 में आगामी जनगणना में जातीय गणना शामिल करने के फैसले की घोषणा की थी। सरकार ने इसे समाज के व्यापक हितों और सामाजिक-आर्थिक समझ को बेहतर बनाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया था।

जातीय आंकड़ों की उपलब्धता से आरक्षण, सामाजिक प्रतिनिधित्व और विभिन्न समुदायों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति पर बहस को नया आधार मिल सकता है। वहीं, इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के बीच अलग-अलग विचार भी सामने आते रहे हैं।

सामाजिक सौहार्द पर जोर

भारत में जातीय और सामाजिक विविधता के बीच सामाजिक सौहार्द बनाए रखना लंबे समय से सार्वजनिक नीति और सामाजिक बहस का विषय रहा है। राष्ट्रीय एकता परिषद ने भी अतीत में जातीय, क्षेत्रीय और पहचान आधारित विभाजनों को राष्ट्रीय एकीकरण से जुड़े मुद्दों के रूप में रेखांकित किया था और समानता, न्याय तथा भाईचारे को महत्वपूर्ण बताया था।

स्वामी रामदेव के ताजा बयान में भी मुख्य जोर इसी बात पर रहा कि किसी भी समुदाय को जाति के आधार पर प्रताड़ित न किया जाए और कानून बनाते समय समाज के अलग-अलग वर्गों के प्रभाव को ध्यान में रखा जाए।

फिलहाल रामदेव की टिप्पणी ने जातीय आरक्षण, सामाजिक समानता और कानूनों के प्रभाव को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। उनके ‘गृहयुद्ध’ वाले बयान को उनकी व्यक्तिगत आशंका के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि देश में ऐसी स्थिति पैदा होने के किसी प्रमाणित आकलन के रूप में।

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