नैनीताल : मां नंदा की भावुक विदाई

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नैनीताल – सरोवर नगरी नैनीताल में इस वर्ष 16 से 23 सितंबर तक नंदादेवी महोत्सव का आयोजन किया गया। आज माँ के डोले का नगर भ्रमण, आयोजक संस्था श्री राम सेवक सभा के तत्वाधान में किया गया और नगर भ्रमण के बाद देर शाम मंदिर के समीप झील में विसर्जित किया जाएगा।आपको बता दें कि इतिहास और स्थानीय परंपराओं में राजा बाज बहादुर चंद का विशेष उल्लेख मिलता है।विद्वानों के कथानानुसार लगभग 17 वीं सदी के आसपास माँ नंदा की प्रतिमा को कुमाऊँ लाया गया और राजपरिवार ने उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित किया। बाद में चंद शासकों ने इस महोत्सव नंदा उपासना को राजपरंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। लेकिन माँ नंदा की आराधना केवल चंद राजाओं तक सीमित नहीं थी। परंपराओं में कत्यूरी और गढ़वाल के पंवार शासकों के साथ भी माँ नंदा उपासना के संबंध मिलते हैं। इसी व्यापक राजपरंपरा के कारण ही माँ नंदा को ‘राजराजेश्वरी’ भी कहा गया।

वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी व श्री राम सेवक सभा के सभी पदाधिकारियों ने सभी श्रद्धालुओं, पर्यटकों व प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं दी जगह जगह भंडारे,जूस,लस्सी व फलों का वितरण किया गया।

लोकमान्यतानुसार माँ नंदा को हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इसलिए कुमाऊँ के लिए माँ नंदा का रिश्ता एक बेटी का है जो कुछ दिनों के लिए मायके आती है और फिर कैलाश लौट जाती है।यही भाव माँ नंदा महोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता है।जो कि आती है तो खुशियाँ साथ लाती है और फिर जब ससुराल वापस जाती है तो उदासी के वातावरण से चहुंओर भावुकता छा जाती है। जैसे कि पूरा कुमाऊँ अपनी बेटी को आंखों में आंसू और हृदय में आशीर्वाद देकर विदा कर रहा हो।माँ नंदा की आस्था ने सदियों से कुमाऊँ और गढ़वाल को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने का काम भी किया है।

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